हत्याओं के षड्यंत्र में आरोपी बने पत्रकार..!

(ए.ख़ान)

दिल्ली/पटना: देश की राजधानी में संसद से कुछ ही दूरी पर उमर ख़ालिद पर जान लेवा हमला होना और उसके कुछ ही देर बाद सांसद मिनाक्षी लेख़ी का वहाँ पहुँच जाना गहन जाँच का विषय है। इस विषय में उमर ख़ालिद ने अपने ट्विटर हैंडल से सुदर्शन न्यूज़ चैनल के एडिटर सुरेश चव्हाण की एक फ़ोटो हमला करने वाले आरोपियों के साथ साझा करते हुए पत्रकारों को संदेह के कटघरे में ला खड़ा कर दिया है।

 

वही दूसरी ओर महात्मा गाँधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी मोतिहारी के एक प्रोफेसर संजय कुमार को उनके घर में घुसकर उस वक़्त जान से मारने की कोशिश की जब वह किसी अध्यंन कार्य में व्यस्त थे। इस हमले में प्रोफेसर संजय कुमार को काफी चोटें आई हैं। वह बुरी तरह से घायल हैं।

प्रोफेसर को जिंदा जलाने की भी कोशिश की गई और उनको घसीटते हुए डी.नाथ क्लीनिक तक लाया गया।पीड़ित प्रोफेसर संजय को इलाज के लिए पटना रेफर किया गया। इस हमले को लेकर खुद पीड़ित प्रोफेसर संजय कुमार का कहना है कि उनके वाइस चांसलर के ख़िलाफ़ बोलने को लेकर कुछ तत्व काफी पहले से निशाने पर ले रहे थे। लेकिन फेसबुक पर एक टिप्पणी का बहाना लेकर भीड़ द्वारा मेरी हत्या की कोशिश की गई। फ़ेसबुक पर मैंने किसी भी असंसदीय शब्द का प्रयोग नहीं किया। हमलावर विश्वविद्यालय कुलपति के गुर्गे हैं। पूर्व के वीसी के ख़िलाफ़ हुए आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के समय से उन्हें यह लोग धमकी देते रहे हैं और शनिवार को फेसबुक पोस्ट को बहाना बना कर हमला किया गया।

प्रोफेसर संजय कुमार ने थानाध्यक्ष मोतिहारी सदर को लिखित तहरीर दी जिसमें उन्होंने राहुल आर.पांडे, अमन बिहारी वाजपेयी, शन्नी वाजपेयी के नेतृत्व में 20-25 लोगों ने मुझ पर जान से मारने की नीयत से हमला कर दिया। पीटते हुए वो लोग कह रहे थे कि तुम कुलपति के ख़िलाफ़ बोलते हो, ज्ञानेश्वर गौतम के ख़िलाफ़ बोलते हो, ब्यूरो प्रमुख संजय कुमार सिंह (दैनिक भास्कर) के ख़िलाफ़ बोलते हो। इस मामले में भी एक बार फिर पत्रकार का नाम जुड़ गया। मुझे पीटते हुए वो लोग कह रहे थे कि तुम इस्तीफ़ा देकर चले जाओ नहीं तो शाम को आकर ज़िंदा जला देंगें। भीड़ द्वारा किसी भी व्यक्ति की हत्या के नए-नए मामले रोज़ सुनने और देखने को मिल रहे है। संसद में भी मोब लिंचिंग का मुद्दा गरम है उसके बावजूद एक प्रोफेसर के साथ ऐसी घटना का होना सरकार और कानून के रखवालों पर सवाल खड़े करता है।

इस गंभीर विषय में जब थानाध्यक्ष मोतिहारी से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। ख़बर लिखे जाने तक थानाध्यक्ष से कोई बात नहीं हुई है। लेकिन हम इस गम्भीर विषय पर बात करने का लगातार प्रयास कर रहे है ताकि पीड़ित को इन्साफ मिल सके और जनता का लोकतंत्र में विश्वास बना रहे।लेकिन इन दोनो घटनाओं ने पत्रकार बन्धुओं को सवालों के कटघरे में ला खड़ा कर दिया है। लेकिन अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस द्वारा दोनो ही मामलों में पत्रकारों की भूमिका की जाँच होगी? या ऊँचे रसूक के चलते यह बच निकलेंगे?

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