नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने सरकारी अस्पतालों के लिए चिकित्सा सामग्री और उपकरणों की खरीद में कथित 650 करोड़ रुपये के घोटाले के मामले में तीन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की जांच के बाद डॉ. विनोद कुमार रंगा, डॉ. वत्सला अग्रवाल और नीरज चोपड़ा के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति दी गई है। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने इन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए दिल्ली सरकार से अनुरोध किया था। सरकार की मंजूरी के बाद अब मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।
जांच के दौरान भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने सबसे पहले 18 जून को केंद्रीय खरीद एजेंसी के तत्कालीन प्रमुख डॉ. विनोद कुमार रंगा को गिरफ्तार किया था। उन पर आरोप था कि आपूर्तिकर्ताओं की ओर से आने वाले दस्तावेज और दर निर्धारण से संबंधित फाइलें उनके पास भेजी जाती थीं, जिन्हें वह निविदा समिति के समक्ष प्रस्तुत करते थे। जांच आगे बढ़ने के बाद जुलाई में तत्कालीन महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं डॉ. वत्सला अग्रवाल और लेखा विभाग के अधिकारी नीरज चोपड़ा को भी गिरफ्तार किया गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि डॉ. वत्सला अग्रवाल को खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जानकारी थी, इसके बावजूद संबंधित फाइलों को आगे बढ़ने दिया गया। वहीं नीरज चोपड़ा पर आपत्तियों के बावजूद कथित तौर पर अनियमित भुगतान की प्रक्रिया को मंजूरी देने का आरोप लगाया गया है।
मामले में निजी आपूर्तिकर्ता राजीव कुमार रंगीला को भी गिरफ्तार किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी द्वारा उसके खिलाफ कार्रवाई तेज किए जाने और तलाश संबंधी कार्रवाई के बीच उसने आत्मसमर्पण किया। पूछताछ के बाद उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया। जांच में सरकारी खरीद के लिए निर्धारित सरकारी ई-बाजार के नियमों और प्रक्रिया का कथित रूप से पालन नहीं किए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि जिन वस्तुओं और उपकरणों की खरीद निर्धारित ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से होनी थी, उनमें नियमों का उल्लंघन किया गया।
जांच एजेंसी के अनुसार, मामले में कई कथित फर्जी और आवरण कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। इनमें एफ मेड डिवाइसेज, टेक्नोक्रेट्स, राजश्री, आशी सर्जिकल एंड फार्मास्यूटिकल्स और एम साहिब एंड संस प्राइवेट लिमिटेड के नाम शामिल हैं। जांच में आरोप लगाया गया है कि इन कंपनियों का स्वामित्व कागजों पर घरेलू सहायकों या अन्य व्यक्तियों के नाम पर दिखाया गया था। इन कंपनियों के माध्यम से चिकित्सा सामग्री और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया को प्रभावित करने तथा आपूर्ति के लिए दरें निर्धारित करने के आरोपों की जांच की जा रही है।
भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के अनुसार, निजी आपूर्तिकर्ता ने कथित तौर पर निर्माताओं के साथ सांठगांठ कर विभिन्न वस्तुओं की आपूर्ति दर निर्धारित कराई और कमीशन प्राप्त किया। आरोप है कि कई चिकित्सा सामग्री और उपकरण सामान्य बाजार दरों की तुलना में कई गुना अधिक कीमत पर खरीदे गए, जिससे सरकारी राजकोष को नुकसान पहुंचा। जांच के दौरान लेखा विभाग के कुछ अधिकारियों द्वारा कथित अनियमित भुगतानों पर आपत्ति जताए जाने की बात भी सामने आई है। आरोप है कि इन आपत्तियों को दरकिनार कर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
प्रारंभिक जांच के दौरान सचिवालय से कुछ महत्वपूर्ण निविदाओं और कार्यादेशों से संबंधित फाइलें नहीं मिलने की बात भी सामने आई। जांच एजेंसी इस पहलू की भी पड़ताल कर रही है। मामले की जांच का दायरा दिल्ली के अलावा हरियाणा और उत्तराखंड तक बताया गया है। संबंधित संपत्तियों और कथित नेटवर्क की भी जांच की जा रही है।
मामले में जांच एजेंसी की ओर से करीब 12,000 पन्नों का विस्तृत आरोपपत्र अदालत में दाखिल किए जाने की जानकारी दी गई है। इसमें कई अन्य चिकित्सकों, कर्मचारियों और बाहरी एजेंसियों से जुड़े लोगों की भूमिकाओं की भी जांच का उल्लेख है। सरकार की ओर से तीन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी मिलने के बाद अब मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायालय में होने वाली सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।