गुजरात में चांदीपुरा वायरस से 22 बच्चों की हुई मौत

नई दिल्ली/गुजरात: चांदीपुरा वायरस से गुजरात में अब तक 22 बच्चों की मौत हो चुकी है। बारिश के मौसम में इस वायरस के मामले ज्यादा आते हैं। यह इतना खतरनाक है जिससे इतनी मौत हो चुकी है। क्या यह वायरस दूसरे राज्यों में भी फैल सकता है। इससे बचना है तो क्या करें? ऐसे तमाम सवालों का जवाब हम जानेंगे।


चांदीपुरा वायरस का नाम महाराष्ट्र के चांडीपुरा शहर के नाम पर रखा गया है। इस वायरस की पहचान सबसे पहले 1965 में हुई थी और यह वायरस “वायरल संक्रमण” से होता है इससे संक्रमित होने के बाद बुखार, सिरदर्द, थकान, शरीर और मांसपेशियों में दर्द, उल्टी दौरे पड़ना जैसे लक्षण सामने आते हैं।


इस बारे में दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ एल.एच घोटेकर ने बताया कि चांदीपुरा वायरस हर मामले में गंभीर नहीं होता है, लेकिन अगर समय पर इसके लक्षणों की पहचान न हो तो यह खतरनाक हो सकता है। संक्रमण काबू में न होने पर यह धीरे- धीरे बढ़ता रहता है और इससे शुरुआत में तेज खांसी आती रहती है और उसके बाद सांस लेने में परेशानी होने लगती है।


डॉ घोटेकर बताते हैं कि कुछ गंभीर मामलों में इस वायरस से निमोनिया, एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (ARDS) और एन्सेफलाइटिस (दिमाग की सूजन) तक हो जाती है  अगर ये वायरस दिमाग पर अटैक कर दे और कंट्रोल में न हो तो मौत हो जाती है।


डॉ घोटेकर बताते हैं कि चांदीपुरा वायरस ज़ूनोटिक है, यानी यह जानवरों में पनपता है और इंसानों में फैल सकता है इंसानों में यह संक्रमण सैंडफ्लाई (बालू मक्खी), टिक्स (किलनी) और मच्छरों के संपर्क से हो सकता है। बारिश के मौसम में इसके केस ज्यादा सामने आते हैं, 14 साल तक के बच्चों में यह केस ज्यादा देखे जाते है।



डॉ घोटेकर कहते हैं कि इस वायरस को फैलाने वाली मक्खी और मच्छर जहां-जहां होंगे वहां इस वायरस के मामलों आने की आशंका ज़्यादा रहेगी। ऐसे में दूसरे राज्यों में भी इससे बचाव के कदम उठाने जरूरी हैं।


इससे बचने के कुछ उपाय है जैसे साफ़-सफ़ाई रखना, नियमित रूप से साबुन और पानी से हाथ धोना, जंगली जानवरों से दूरी बनाए रखना और जंगली जानवरों और उनके रहने की जगहों के संपर्क में कम से कम आना। वायरस फैलाने में कीड़ों की संभावित भूमिका को देखते हुए, कीड़ों को दूर भगाने वाली चीज़ों और मच्छरदानी का इस्तेमाल करा जाए।